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बुधवार, 6 जून 2018

भारत विभाजन का दर्द

भारत विभाजन का दर्द





1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन की कई दर्दनाक कहानियां है। ऐसी ही एक कहानी है तत्कालीन कश्मीर रियासत के एक शहर मीरपुर की। पर मीरपुर...


1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन की कई दर्दनाक कहानियां है। ऐसी ही एक कहानी है तत्कालीन कश्मीर रियासत के एक शहर मीरपुर की। पर मीरपुर की कहानी इस मायने में ज्यादा दर्दनाक है कि यहाँ के हिन्दू वाशिंदों को पाकिस्तानी सेना से बचाने की गुहार को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और तत्कालीन कश्मीर रियासत के प्रमुख शेख अब्दुल्ला ने अनसुना कर दिया और उन्हें पाकिस्तानी सेना के हाथो मरने को छोड़ दिया। परिणामतः पाकिस्तानी सेना ने मीरपुर पर आक्रमण कर के 18000 हिन्दुओं और सिक्खों की हत्या कर दी। पाकिस्तानी फौज करीब पांच हजार युवा लड़कियों और महिलाओं का अपहरण कर पाकिस्तान ले गई जिन्हें बाद में मंडी लगाकर बेचा गया।

आइए घटनाक्रम को विस्तार पूर्वक जानते है।

मीरपुर जम्मू-कश्मीर रियासत का एक हिंदू बहुल शहर था। बटवारे के समय मीरपुर के सभी मुसलमान 15 अगस्त के आसपास बिना किसी नुकसान के पाकिस्तान चले गए थे और पाकिस्तान के पंजाब से हजारों हिंदू और सिख मीरपुर को भारत का अंग मानकर वहां आ गए । इस कारण उस समय मीरपुर में हिंदुओं की संख्या करीब 40 हजार हो गई । मुसलमानों के खाली मकानों के अलावा वहां का बहुत बड़ा गुरुद्वारा दमदमा साहिब, आर्य समाज, सनातन धर्म सभा और बाकी सभी मंदिर शरणार्थियों से भर गए थे। यही हालत कोटली, पुंछ और मुजफ्फराबाद में भी हुई।

पाकिस्तानी इलाकों से भागे हुए हिंदू और सिख यहां आ रहे थे। किन्तु नेहरू सरकार ने यहां अपना कब्जा मजबूत करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया और न ही कश्मीर की तत्कालीन सरकार ने हिंदुओं की रक्षा के लिए सेना की टुकड़ी ही यहां भेजी। यह क्षेत्र केवल आठ सौ सैनिकों की महाराजा की सेना की एक टुकड़ी के सहारे था। उनमें भी आधे से अधिक मुसलमान थे, जो अपने हथियारों समेत पाकिस्तान की सेना से जा मिले । हमलावरों को महाराजा की सेना की यह छोटी-सी टुकड़ी आखिर कब तक रोकती । सैनिक मरते जा रहे थे।

इधर 16 नवंबर तक बड़ी संख्या में भारतीय सेना कश्मीर आ चुकी थी। 13 नवंबर को शेख अब्दुल्ला दिल्ली पहुंच गए। 14 नवंबर को नेहरू ने मंत्रिमंडल की जल्दी में बैठक बुलवाई और सेना मुख्यालय को सेना झंगड़ से आगे बढ़ने से रोकने के आदेश दिए। मीरपुर की ओर पीर पंचाल की ऊंची पहाड़ी है। यहां तक भारतीय सेनाओं का नियंत्रण हो चुका था। परंतु आदेश न मिलने के कारण सेना आगे नहीं बढ़ी।

मीरपुर के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे थे। जम्मू के हिन्दू नेता मेहरचंद महाजन ने शेख अब्दुल्ला को बताया कि मीरपुर में 25 हजार से ज्यादा हिंदू-सिख फंसे हुए हैं। उन्हें सुरक्षित लाने के लिए कुछ किया जाना चाहिए। लेकिन मीरपुर में शेख अब्दुल्ला ने सेना नहीं भेजी। मीरपुर की हालत जान कर जम्मू का एक प्रतिनिधि मंडल 13 नवंबर को दिल्ली गया। नेहरूजी ने पूरे प्रतिनिधि मंडल को कमरे से बाहर निकलवा दिया और अकेले मेहरचंद महाजन से बात की। नेहरू ने उन्हें शेख अब्दुल्ला से ही बात करने कहा। इसके बाद यह लोग सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास गए। सरदार ने कहा कि वह बेबस हैं। पटेल ने कहा कि पंडित नेहरू कल (15 नवम्बर, 1947) जम्मू जा रहे हैं। आप वहां उनसे मिले सकते हैं। 15 नवंबर को जब पंडित नेहरू जम्मू पहुंचे तो हजारों लोग उनका इंतजार कर रहे थे। नेहरूजी बिना किसी से बात किए चले गए। इधर, दिल्ली में ये लोग महात्मा गांधी से मिले तो उन्होंने जवाब दिया कि मीरपुर तो बर्फ से ढंका हुआ है। उनको यह भी नहीं पता था कि मीरपुर में तो बर्फ ही नहीं पड़ती।

इन बेचारों का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि मीरपुर के निवासी अपने आपको भारत का अंग मानकर मदद की आस लगाए करीब तीन महीने तक इंतजार करते रहे। मदद नहीं मिली। कश्मीर में सेना की कमान नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को देकर सबसे बड़ी भूल कर दी। शेख अब्दुल्ला ने सेना को मुस्लिम बहुल इलाकों में ही भेजा, जबकि सेना की एक टुकड़ी मीरपुर के समीप ही थी। शेख ने उसे दूसरे स्थान पर भेजने के आदेश दे दिए। जब भारतीय सेना की टुकड़ी को दूसरी तरफ भेजे जाने की जानकारी पाकिस्तानी सेना को मिली, तो उसके सैनिक मीरपुर पर टूट पड़े। घर जलाए गए। महिलाओं, लड़कियों और बच्चों के साथ जुल्म की सभी सीमाएं पार कर दी गईं। मीरपुर में उस दौरान करीब 18 हजार हिंदू और सिखों को पाकिस्तानी फौज ने मार दिया।

मीरपुर में उत्तर की ओर गुरुद्वारा दमदमा साहिब और सनातन धर्म मंदिर थे। इनके बीच में एक बहुत बड़ा सरोवर और गहरा कुआं था। जान बचाने को लोग शहर छोड़कर भागने लगे | लेकिन रास्ते में पाकिस्तान की फौज ने घेर कर उनका कत्लेआम कर दिया। किसी परिवार का एक व्यक्ति मारा गया था, किसी के दो व्यक्ति। कई ऐसे थे जिनकी आंखों के सामने उनके भाइयों, माता-पिता और बच्चो को मार दिया गया था। कई ऐसे थे जो रो-रो कर बता रहे थे कि कैसे वे लोग उनकी बहन-बेटियों को उठाकर ले गए।

जो लोग मीरपुर में रुके रहे उनकी कहानी तो और भी दारुण है | आर्य समाज के स्कूल के छात्रावास में 100 छात्राएं थीं। छात्रावास की अधीक्षिका ने लड़कियों से कहा अपने दुपट्टे की पगड़ी सर पर बांधकर और भगवान का नाम लेकर कुओं में छलांग लगा दें और मरने से पहले भगवान से प्रार्थना करें कि अगले जन्म में वे महिला नहीं, बल्कि पुरुष बनें। बाद में उन्होंने खुद भी छलांग लगा दी। कुंआ इतना गहरा था कि पानी भी दिखाई नहीं देता था।

पाकिस्तानी पांच हजार हिंदू लड़कियों को पकड़ कर ले गए। बाद में इनमें से कई को पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अरब देशों में बेचा गया। इस समूचे घटनाक्रम में 18,000 से ज्यादा लोग मारे गए।

वर्तमान में मीरपुर पाकिस्तान में है लेकिन वहां पुराने मीरपुर का नामोनिशान बाकी नहीं है। पुराने मीरपुर को पाकिस्तान ने झेलम नदी पर मंगला बाँध बना कर डुबो दिया है। इससे बड़ा मजाक क्या होगा कि हम उसी मीरपुर में जाकर टेस्ट मेच भी खेल आते हैं |

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