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सोमवार, 28 मई 2018

ज्वार उठाना होगा - मस्तक कटाना होगा

महासमर की बेला है
वीरों अब संधान करो,
शत्रु को मर्दन करने को,
त्वरित अनुसंधान करो |
मातृभू की खातिर फिर
लहू बहाना होगा;
ज्वार उठाना होगा,
मस्तक कटाना होगा|
सिंहासन की कायरता से ,
संयम अब डोल रहा
चिरस्थायी संस्कृति हित ,
कडक संघर्षों को खोल रहा|
अखिल विश्व की दिव्य मनोरथ,
अधरों में अब डोल रहा,
लुट रही मानवता नित-क्षण
लंपट सदा कायरों की भाषा
बोल रहा|
वीरों को आगे आना होगा,
संघर्ष शिवाजी सा –
सतत् बढाना होगा
आतंक भगाना होगा,
जिहाद मिटाना होगा |
उठो! अमर सपूतों,
और एक बार
मस्तक कटाना होगा,
भारत बचाना होगा
समृद्धि लाना होगा !
अखंड भारत अमर रहे !
©
कवि आलोक पाण्डेय

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

वह

                                  वह                                    



              
                   वह         


आर्त्त गैया की पुकार

                  आर्त्त गैया की पुकार                                      





कहो सत्य कथा विस्तृत

                         कहो सत्य कथा विस्तृत                        




कहो सत्य कथा विस्तृत !

राष्ट्रकवि आलोक पान्डेय

अहो बन्धु ! कहो सत्य कथा विस्तृत
शुद्ध-भाव,उन्नत विचार लेकर हूँ प्रस्तुत
योगिराज की ध्यान सुना दो
या सुना दो जयघोष,
हिमालय सा अटल, हिमगिरी की गंगा सा निर्मल
अहा , कैसा विराट् वीरों का रोष !
वीर विक्रमों का गौरव सत्य का संधान,
सुना दो या कोई ‘विजयध्वज’ का अनुसंधान
जयजयध्वनि प्रतिमन्दिरों का या,
सुना दो शाश्वत अपौरूषेय वेदघोष
ज्वाल्यन्ते करालानी,या पुराणों का शौर्य जय घोष |
सुगंधित तुलसीवनानी सा या खौलते रूधिर-धारा का प्रवाह;
अनल ज्वलन ‘अरि’ विविध का,
परितः प्रस्फुट नीति-न्याय संवाह|
दृश्य न्याय-दर्शन सदा, अवलोक्यते शौर्य संचार
पूरयति सत्य अनेक शतकानी,
व्यतितानी यदि शुद्ध विचार
चन्द्रमण्डल सा धवल परिवेेष्टित ,
मन्ये कथितं तेज उत्कर्ष ;
कालवेग प्रकम्य सतत् वीरों का,
ज्ञायते तेजपुञ्ज हे भारतवर्ष !
अखंड भारत अमर रहे
वन्दे मातरम् !
जय हिन्दुस्थान हिन्दू भूमि
©

कवि आलोक पाण्डेय

बुधवार, 28 मार्च 2018

आज मेरा मन डोले !

🌇


आकुल-व्याकुल आज मेरा मन, ना जाने क्यों डोले…
विघटित भारत की वैभव को ले ले,
भाषा इंकलाब की बोले,
आज मेरा मन डोले !
कष्टों का चित्रण कर रहा व्यथित ह्रदय मेरा
सुदृढ़ दासता और बंधन की फेरा…..
उजड़ रही जीवों की बसेरा,
सुखद शांति की कब होगी सबेरा…..!
न्यायप्रिय शांति के रक्षक, त्वरित क्रांति को खोलें….
आज मेरा मन डोले…..!
भाषा इंकलाब की बोले…..!
वृथा ! भारत क्या यही भारत है
किस आखेट में संघर्षरत है
सतत् द्रोह बढता अनवरत है
नहीं कहीं मानवताव्रत है…?
संकुचित पीडित सीमाएँ कहती , पूर्ववत फैला ले
आज मेरा मन डोले !
भाषा इंकलाब की बोले
जीर्ण – शीर्ण वस्त्रों में रहकर
वर्षा- ताप- शीतों को सहकर
चना-चबेना ले ले , भूखों रहकर...
स्वदेश भक्ति न छोडा, प्राण भी देकर
यशगाथा वीरों की पावन, नयन नीर बहा ले….
आज मेरा मन डोले…..!
भाषा इंकलाब की बोले…
उथल-पुथल करता मेरा मन……
ना जानें क्यों डोले
भाषा इंकलाब की बोले…

- कवि पं आलोक पान्डेय