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शुक्रवार, 1 मार्च 2019

पाकिस्तानी जनमानस की करूण पुकार



त्राही-त्राही करती मानवता ,
 दशकों से संकुचित दर्द को खोली है ,
आतंकिस्तान की जनमानस सहमी मौन-स्वर में बोली है ।
घाटी में आतंक भयावाह , कैसा क्रूरता का प्रतिरूप खड़ा , 
पशुता को करता साकार , हीन सभ्यता का रूप अडा़ ।
बर्बर है यह समाज  विश्व में , धरती का कालिख कलंक ,
जहां जिहादी नग्न-नाच , होता सदैव इसके अंक ।
पेशावर - कराची सब आतंकित ,
 दग्ध झुलस उठा लाहौर ,
ब्लूचिस्तान से लपटें निकले ,  जलाती गुलाम कश्मीर ( POK ) की पावन छोर ।
अन्दर-अन्दर से सहमे , डूब रहे करके क्रंदन ,
मानवता विकृत हो चुकी कब की , क्रूर प्रहार दासता की बंधन ।
शासक यहां का लंपट , कायर , आतंकों का करता व्यापार
 जनमानस को करता प्रताड़ित , बलात् करता व्याभिचार !
मदरसों में शिक्षा कहां , बलात् होता बलात्कार ,
हाय ! लज्जा की बात बहुत , बहुत मची है चीख-चीत्कार ।
सेना के आतंकों से , हर ओर मची है करूण-पुकार ,
हर सांझ-सबेरा होता यहां , बारूदों गोलों की बौछार ।

नहीं पहनने को चीर-वसन , हैं बहु खाने को लाले ,
धरती बंजर जिहादी खेती से , अब कैसे निज जीवन संभालें !
यहां बसती है हवाओं में दग्ध आतंक लहर की ,
सच पूछो तो हम सहमे - असहाय ,
 कैसे करूं वर्णित जिहादी कहर की ; 
अब आस नहीं दुनिया से , केवल एक निमिष प्रलय-पहर की ,
 मुक्ति चाहती बेबस- कुंठित  आवाम , पाकिस्तानी हर गांव-शहर की ।
झूलस रही बाल कणिकाएं , झुलस रहा हर मृदु यौवन ,
झुलस रहा हर प्रणय आस , कंपित कुंठित हर जीवन ।
विघटित भारत की यह पुण्यभूमि , कितने आहों को झेली है ,
हर प्रहर , आतंकी क्रुर कहर से , सिंधु घाटी भी डोली है ।
लूट रही सतत् सौम्य प्रकृति , लूट चुका हिन्द-तप विहार ,
लूट चुका उन्नत निति-नियामक , लूट चुका विशुद्ध-संस्कार ।
धरती पर कर रही तांडव , आतंक की विविध प्रकार ,
बहु डूब चुका जन-जन जीवन , हे भारत के कर्णधार !
बहुत अशिक्षा में जकड़े हम, दूर तक दिखता कोई मर्ज नहीं ,
हे भारत के वीर सपूत , क्या तेरा कोई फर्ज नहीं !
अंदर से उठता असह्यनीय वेदना , जग उठो हे भारत वीर ,
विश्व शांति मानवता हित , ले कराल प्रलयंकर रूप गंभीर !
निज अस्त्रों का संधान कर , आतंक मुक्त कर दे इस माटी को ,
जय भारती के स्वर से सस्वर संवहित कर दे घाटी को ।
बालाकोट को नष्ट किये , अबकी बार बहावलपुर , लाहौर ;
और आगे सतत् विध्वंस करते जाना , जहां-जहां पनपे आतंक का ठौर !
_____

अखंड भारत अमर रहे !
©
✍️ कवि आलोक पाण्डेय
वाराणसी ,भारतभूमि

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

सुनो सिंहासन के रखवाले !



जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले के अवंतिपुरा में आतंकी हमले में हुतात्मा वीरों के याद में शासनतंत्र को कर्तव्यबोध दिलाती एक कवि की भावपूर्ण कविता –
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कविता
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कह रहा स्तब्धित खड़ा हिमालय, घुटता रो-रो सिंधु का नीर,
हे भारत के सेवक जगो, क्यों मौन सुषुप्त पड़े अधीर !
क्रुर प्रहार झंझावातों में, जीवन नैया धीरों की डूब गयी,
विस्फोटों को सहते-सहते , जनमानस उद्वेलित अब उब गयी ।
ले उफान गंगा की व्याकुल धारा , छोड़ किनारा उछल रही ;
नर्मदा दुख से आहत हो , युद्ध हेतु दृढ़ सबल दे रही ।
जिहादों से घूट-घुट , हर दिन वीर मरे जाते हैं,
विस्फोटों के धुएं में हर धीर कटे जाते हैं ।
आज वीर मरे जो हैं , धैर्य देश का डोला है ,
शासन की कर्तव्य बोध को जनमानस ने तोला है ।
बिलख रही कुमकुम रोली, बिलख रही नूपुर की झंकार,
बिलख रही हाथों की चूड़ियाँ , हाय ! बिलख रही मृदु कंठ-हार ,
बिलख रही धरा झंझावातों से, बिलख रही नयन नीर-धार ;
बिलख रही कैसी सौम्य सुरम्य प्रकृति , बिलख रही अखंड सौम्य श्रृंगार !
कारगिल की शौर्य पताका , नभोमंडल में डोल रही,
हे भारत के कर्णधार युद्ध कर अब बोल रही !
डोली शौर्य पताका वीर शिवा की, हल्दीघाटी भी डोली है ,
बिस्मिल की गजलें भी डोली , डोली वीर आजाद की गोली है ।
वीरों की माटी की धरती , अपने गद्दारों से डोल रही ;
अकर्मण्य , अदूरदर्शी , सत्तालोलुपों से , कड़क भाषा अब बोल रही !
हे सिंहासन के रखवाले , करो याद कर्तव्य करो विचार ,
सिसक रहा है सारा देश , सर्वत्र मची है करूण पुकार ,
धरणी सीमाओं पर तांडव करती , कैसी मानव की पशुता साकार ;
क्या व्यर्थ जाएगा यह बलिदान या कर पाओगे अमोघ प्रतिकार !
माथे का कलंक भयावह , जगे शौर्य कंटक दंश मिटे ;
शत्रु को धूल-धूसरित कर , फिदायीन जालों के पंख कटे ।
आतंक मिटाने में बाधक , किसी का मत तथ्य सुनो तुम ;
जिहादियों को राख कर दे , स्वाभिमानी उपक्रम चुनो तुम !
महा समर की बेला है , ले पाञ्चजन्य उद्घोष करो ;
शत्रु को मर्दन करने को , त्वरित आर्ष भाव में रोष भरो ।
सेना को आदेश थमा दो , भयावह विप्लव ध्वंस मचाने को ;
अपने गद्दारों सहित समूचे आतंकिस्तान विध्वंस कराने को ।
_____
अखंड भारत अमर रहे !
©
✍🏻 कवि आलोक पाण्डेय
वाराणसी ,भारतभूमि

बुधवार, 6 जून 2018

भारत विभाजन का दर्द

भारत विभाजन का दर्द

आ जा चित्तवन के चकोर

आ जा चित्तवन के चकोर

ज्वार उठाना होगा-मस्तक कटाना होगा

ज्वार उठाना होगा - मस्तक कटाना होगा

सोमवार, 28 मई 2018

ज्वार उठाना होगा - मस्तक कटाना होगा

महासमर की बेला है
वीरों अब संधान करो,
शत्रु को मर्दन करने को,
त्वरित अनुसंधान करो |
मातृभू की खातिर फिर
लहू बहाना होगा;
ज्वार उठाना होगा,
मस्तक कटाना होगा|
सिंहासन की कायरता से ,
संयम अब डोल रहा
चिरस्थायी संस्कृति हित ,
कडक संघर्षों को खोल रहा|
अखिल विश्व की दिव्य मनोरथ,
अधरों में अब डोल रहा,
लुट रही मानवता नित-क्षण
लंपट सदा कायरों की भाषा
बोल रहा|
वीरों को आगे आना होगा,
संघर्ष शिवाजी सा –
सतत् बढाना होगा
आतंक भगाना होगा,
जिहाद मिटाना होगा |
उठो! अमर सपूतों,
और एक बार
मस्तक कटाना होगा,
भारत बचाना होगा
समृद्धि लाना होगा !
अखंड भारत अमर रहे !
©
कवि आलोक पाण्डेय

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

वह

                                  वह                                    



              
                   वह