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रविवार, 12 मई 2019

                     मां तुझे भूला ना पाया !


माँ!

माँ
एक दिवस मैं रूठा था

बडा ही स्वाभिमानी बन, उऋण हो जाने को
तुमसे भी विरक्त हो जाने को,
त्यागी बन जाने को !
घर त्याग चला कहीं दूर वन को
ध्यानिष्ठ हुआ पर ध्यान नहीं , न शांति होती मन को
यह चक्र सतत् चलता रहा।
पर जननी ! तेरी याद कहाँ भूलता रहा !!
पर नहीं, तप तो करना है;
त्याग धर्म में मरना है,
यह सोच अनवरत् उर्ध्व ध्यान में
हो समाधिस्थ तपः क्षेत्र में,
मन, तन से दृढ हो तप पूर्ण किया
पर नहीं शांति थी ना सुस्थिरता, 

क्या ऐसा अपूर्ण हुआ !!!
बुझा हुआ अब संचित उत्साह था 
नहीं कहीं पूर्ण प्रवाह था ;
अचानक क्षुधा की प्यास लगती
माँ !!!
तेरी कृपा की आस लगती
ममतामयी छाया न भूलती;
        दोपहरी तपी और पाँव जले
        पर कहाँ सघन छाया?
माँ!
तेरी आँचल न भूला पाया; 
हर ओर तुम्हारी थी छाया !

___________

           ✍🏻 आलोक पाण्डेय
                  ( वाराणसी , भारतभूमि )

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

नमन हे आर्यभट्ट


नमन आर्यभट्ट


ग्रह नक्षत्र सूत्र समेकन नदियों का कल कल निनाद ,
गणित सार ज्योतिष रहस्य करता सदैव हे आर्यभट्ट याद !
है सत्य धरा को तूने शुन्य परिचय ज्ञान दिया ,
सागर की गहराई से अंतरिक्ष ऊंचाई का मान दिया ।
पृथ्वी मान परिक्रमा परिधि को दिखलाया तूने विचित्र ,
 ‘आर्यभट्टीयम’ रचना अमोघ को कैसे दिया साध सुचित्र ।
राष्ट्र गुरु नहीं विश्वगुरु हो , हो भारत की अमर वाणी ;
 युग युग से कीर्ति रहे अमर , हे सुसंस्कृत सभ्यता के प्राणी ।
ग्रह का ज्ञान स्पष्ट परिलक्षित , पाई को तूने साध दिया ,
 खगोल अन्वेषण संधानों से पूरे भूगोल को बांध दिया ।
समस्त भूमण्डल को कर प्रकाशित , किया मेधा शक्ति संपन्न ,
टुकड़े-टुकड़े लुटेरों तंत्र ने आज , हाय ! विघटित कर किया विपन्न ।
दूरदर्शिता विश्व सभ्यता के रक्षक पुन: आओ हे भारत वीर ;
कटुता-विक्षोभ, विघटन मिटाने लाना अतीव सूत्र गंभीर !
हे विप्रश्रेष्ठ ! शत बार नमन ।
अनंत अपार प्रणमन् वंदन !

✍🏻 आलोक पाण्डेय
          वाराणसी,भारतभूमि

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

कहो सत्य कथा विस्तृत

अहो बन्धु ! कहो सत्य कथा विस्तृत
शुद्ध-भाव,उन्नत विचार लेकर हूँ प्रस्तुत
योगिराज की ध्यान सुना दो
या सुना दो जयघोष,
हिमालय सा अटल, हिमगिरी की गंगा सा निर्मल
अहा , कैसा विराट् वीरों का रोष !
वीर विक्रमों का गौरव सत्य का संधान,
सुना दो या कोई ‘विजयध्वज’ का अनुसंधान
जयजयध्वनि प्रतिमन्दिरों का या,
सुना दो शाश्वत अपौरूषेय वेदघोष
ज्वाल्यन्ते करालानी,या पुराणों का शौर्य जय घोष |
सुगंधित तुलसीवनानी सा या खौलते रूधिर-धारा का प्रवाह;
अनल ज्वलन ‘अरि’ विविध का,
परितः प्रस्फुट नीति-न्याय संवाह|
दृश्य न्याय-दर्शन सदा, अवलोक्यते शौर्य संचार
पूरयति सत्य अनेक शतकानी,
व्यतितानी यदि शुद्ध विचार
चन्द्रमण्डल सा धवल परिवेेष्टित ,
मन्ये कथितं तेज उत्कर्ष ;
कालवेग प्रकम्य सतत् वीरों का,
ज्ञायते तेजपुञ्ज हे भारतवर्ष !

अखंड भारत अमर रहे 🚩
वन्दे मातरम् !
जय हिन्दुस्थान हिन्दूभूमि

©

✍️ कवि आलोक पाण्डेय
              वाराणसी ,भारतभूमि

बुधवार, 20 मार्च 2019

वीरन के होली कब कहलाई !

वीरन के होली कहलाई !
__________

जी चाहत हौ , हे सखे ! मन सरोजु बढ़ी जाई ,
घटत-घटत दु:सह दु:ख कटुता , वैरु समूल कुम्हिलाई ।
स्याम सलोने गात सरसमय, चित्त-अनुराग सदा जुड़ जाइ ,
मन-काँचैं नाचे जटिल वृथा , साँचे प्रीत रामु प्रतीति दृढाई !
विकट पीड़ा धरती पर पड़ौ , बिखरे सुखद बसंत सुहाई ,
हे हर ! प्रीत धरौ मन-सदन में , तन की व्याप्त झाईं निराई ।
स्वारथ छोड़ु परमारथु लागे , दें छोड़ कुटिल-कुटिलाई ;
तप से उन्नत आतपु सरै , हरौ अकस-उतपातु ढीठलाई !
अधर धरौं प्रिय के प्रिय पर ,
ओठ पर ओठ पटाई ;
भर-भर आलिंगन फाग विहग के, मृदु स्नेह कपाट सटाई ! 
फाल्गुन के उत्पात श्रृंगारमय , भानित भास्वित भनत शुभाई ;
दृढ़ता-सौम्यता हो सरस सन्निहित , हरितदुरित प्रभात समाई ।
जब - जब वीरोचित रीत-प्रीत भाव के , गीत-संगीत से होली आई ;
भारत के फूलवारी क्यारी में , बन्धु ! सुवासित रंगों की खुशबू समाई ।
   जिहादी नंगा नाचे होली में ,  खटके धर्मांधो के धर्मांतरण कुटिलाई ;
जब तलक ठोकैं बन कराल द्रोहियन के , अहा ! तब वीरन
के इ होली कहलाई !

©

✍️ आलोक पाण्डेय
वाराणसी भारतभूमि

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

पाकिस्तानी जनमानस की करूण पुकार



त्राही-त्राही करती मानवता ,
 दशकों से संकुचित दर्द को खोली है ,
आतंकिस्तान की जनमानस सहमी मौन-स्वर में बोली है ।
घाटी में आतंक भयावाह , कैसा क्रूरता का प्रतिरूप खड़ा , 
पशुता को करता साकार , हीन सभ्यता का रूप अडा़ ।
बर्बर है यह समाज  विश्व में , धरती का कालिख कलंक ,
जहां जिहादी नग्न-नाच , होता सदैव इसके अंक ।
पेशावर - कराची सब आतंकित ,
 दग्ध झुलस उठा लाहौर ,
ब्लूचिस्तान से लपटें निकले ,  जलाती गुलाम कश्मीर ( POK ) की पावन छोर ।
अन्दर-अन्दर से सहमे , डूब रहे करके क्रंदन ,
मानवता विकृत हो चुकी कब की , क्रूर प्रहार दासता की बंधन ।
शासक यहां का लंपट , कायर , आतंकों का करता व्यापार
 जनमानस को करता प्रताड़ित , बलात् करता व्याभिचार !
मदरसों में शिक्षा कहां , बलात् होता बलात्कार ,
हाय ! लज्जा की बात बहुत , बहुत मची है चीख-चीत्कार ।
सेना के आतंकों से , हर ओर मची है करूण-पुकार ,
हर सांझ-सबेरा होता यहां , बारूदों गोलों की बौछार ।

नहीं पहनने को चीर-वसन , हैं बहु खाने को लाले ,
धरती बंजर जिहादी खेती से , अब कैसे निज जीवन संभालें !
यहां बसती है हवाओं में दग्ध आतंक लहर की ,
सच पूछो तो हम सहमे - असहाय ,
 कैसे करूं वर्णित जिहादी कहर की ; 
अब आस नहीं दुनिया से , केवल एक निमिष प्रलय-पहर की ,
 मुक्ति चाहती बेबस- कुंठित  आवाम , पाकिस्तानी हर गांव-शहर की ।
झूलस रही बाल कणिकाएं , झुलस रहा हर मृदु यौवन ,
झुलस रहा हर प्रणय आस , कंपित कुंठित हर जीवन ।
विघटित भारत की यह पुण्यभूमि , कितने आहों को झेली है ,
हर प्रहर , आतंकी क्रुर कहर से , सिंधु घाटी भी डोली है ।
लूट रही सतत् सौम्य प्रकृति , लूट चुका हिन्द-तप विहार ,
लूट चुका उन्नत निति-नियामक , लूट चुका विशुद्ध-संस्कार ।
धरती पर कर रही तांडव , आतंक की विविध प्रकार ,
बहु डूब चुका जन-जन जीवन , हे भारत के कर्णधार !
बहुत अशिक्षा में जकड़े हम, दूर तक दिखता कोई मर्ज नहीं ,
हे भारत के वीर सपूत , क्या तेरा कोई फर्ज नहीं !
अंदर से उठता असह्यनीय वेदना , जग उठो हे भारत वीर ,
विश्व शांति मानवता हित , ले कराल प्रलयंकर रूप गंभीर !
निज अस्त्रों का संधान कर , आतंक मुक्त कर दे इस माटी को ,
जय भारती के स्वर से सस्वर संवहित कर दे घाटी को ।
बालाकोट को नष्ट किये , अबकी बार बहावलपुर , लाहौर ;
और आगे सतत् विध्वंस करते जाना , जहां-जहां पनपे आतंक का ठौर !
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अखंड भारत अमर रहे !
©
✍️ कवि आलोक पाण्डेय
वाराणसी ,भारतभूमि

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

सुनो सिंहासन के रखवाले !



जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले के अवंतिपुरा में आतंकी हमले में हुतात्मा वीरों के याद में शासनतंत्र को कर्तव्यबोध दिलाती एक कवि की भावपूर्ण कविता –
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कविता
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कह रहा स्तब्धित खड़ा हिमालय, घुटता रो-रो सिंधु का नीर,
हे भारत के सेवक जगो, क्यों मौन सुषुप्त पड़े अधीर !
क्रुर प्रहार झंझावातों में, जीवन नैया धीरों की डूब गयी,
विस्फोटों को सहते-सहते , जनमानस उद्वेलित अब उब गयी ।
ले उफान गंगा की व्याकुल धारा , छोड़ किनारा उछल रही ;
नर्मदा दुख से आहत हो , युद्ध हेतु दृढ़ सबल दे रही ।
जिहादों से घूट-घुट , हर दिन वीर मरे जाते हैं,
विस्फोटों के धुएं में हर धीर कटे जाते हैं ।
आज वीर मरे जो हैं , धैर्य देश का डोला है ,
शासन की कर्तव्य बोध को जनमानस ने तोला है ।
बिलख रही कुमकुम रोली, बिलख रही नूपुर की झंकार,
बिलख रही हाथों की चूड़ियाँ , हाय ! बिलख रही मृदु कंठ-हार ,
बिलख रही धरा झंझावातों से, बिलख रही नयन नीर-धार ;
बिलख रही कैसी सौम्य सुरम्य प्रकृति , बिलख रही अखंड सौम्य श्रृंगार !
कारगिल की शौर्य पताका , नभोमंडल में डोल रही,
हे भारत के कर्णधार युद्ध कर अब बोल रही !
डोली शौर्य पताका वीर शिवा की, हल्दीघाटी भी डोली है ,
बिस्मिल की गजलें भी डोली , डोली वीर आजाद की गोली है ।
वीरों की माटी की धरती , अपने गद्दारों से डोल रही ;
अकर्मण्य , अदूरदर्शी , सत्तालोलुपों से , कड़क भाषा अब बोल रही !
हे सिंहासन के रखवाले , करो याद कर्तव्य करो विचार ,
सिसक रहा है सारा देश , सर्वत्र मची है करूण पुकार ,
धरणी सीमाओं पर तांडव करती , कैसी मानव की पशुता साकार ;
क्या व्यर्थ जाएगा यह बलिदान या कर पाओगे अमोघ प्रतिकार !
माथे का कलंक भयावह , जगे शौर्य कंटक दंश मिटे ;
शत्रु को धूल-धूसरित कर , फिदायीन जालों के पंख कटे ।
आतंक मिटाने में बाधक , किसी का मत तथ्य सुनो तुम ;
जिहादियों को राख कर दे , स्वाभिमानी उपक्रम चुनो तुम !
महा समर की बेला है , ले पाञ्चजन्य उद्घोष करो ;
शत्रु को मर्दन करने को , त्वरित आर्ष भाव में रोष भरो ।
सेना को आदेश थमा दो , भयावह विप्लव ध्वंस मचाने को ;
अपने गद्दारों सहित समूचे आतंकिस्तान विध्वंस कराने को ।
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अखंड भारत अमर रहे !
©
✍🏻 कवि आलोक पाण्डेय
वाराणसी ,भारतभूमि