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शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

अश्रु नभ को समर्पित करना !


                अश्रु नभ को समर्पित करना!
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घनीभूत घोर घटाएं छाए नील गगन में,
फटे हृदय अविचल हिमगिरि की कम्पन में,
विघटन से छिन्न-भिन्न विकल धरा  आज डोले,
प्रलय के आंसू वृहद निस्सीम व्योम रो ले !
असह्य दु:ख की सिहरन,विरह-वेदना, दुर्निवार बयार पले ;
श्वासों से स्वप्न पराग झरे, पलकों में निर्झरणी मचले ।

दशों दिशाओं में प्रज्जवलित रवि होना चाहे अचल अस्त;
दुर्निवार तूफानों में - रण में भी हो , पग-पग पर पथ प्रशस्त !
रोष की भ्रू-भंगिमा विराट, डोले विस्मित प्रलय  खोले,
उत्तिष्ठ अजेय ! विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले ?
धीर-वीर ,अंगार-शय्या पर मृदुल-कलियां बिछाना ,
ले उर वज्र का, क्षणिक अश्रु-कणिकाओं में नहीं गिराना ।
क्षितिज-भृकुटि पर घिर-धूमिल युग-युग का विषय जनित विषाद,
गुंजित कर दे मही-व्योम, भर दे जग के अंतस् में आत्म निनाद !
दिव्य चेतना प्रकाश बरसाकर,
आत्म एकता में अनिमेष जगाकर ,
स्वाधीन भूमि  ,प्रज्जवलित भूमि की नव्य जागरण लाओ,
बिखरे मन के तम् को कर कुंठित,
अंत: सोपानों में उर्ध्व चढ़ाओ।
मधुर हास-परिहास पलकों से पता अपना हटाकर,
पतझड़ कंटकारी क्षणिकाओं में व्यथा अपनी छुपाकर,
गहन तम् में घिरी चिन्तन भार , सार अर्पित करना ;
अश्रु  नभ को समर्पित करना !

✍🏻 आलोक पाण्डेय 'विश्वबन्धु'

अश्विन शुक्ल सप्तमी

रविवार, 8 सितंबर 2019

सदा बढ़ो तुम !


सदा बढ़ो तुम !
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जीवन पथ पर बढ़ते जाओ
 सदा बढ़ो ऊंचे उठो तुम ,
क्षमा दया तप त्याग धैर्य से
बनो दृढ़ निश्चयी, स्वत्व गढ़ो तुम !
हिमालय सी अटल उत्साह लिए
सीखो कहीं भी अडिग होना,
बन हिमगिरि की गंगा सा निर्मल
न विचल होना न निरंतरता खोना !
शुद्ध-विशुद्ध स्वरूप लिए
हो जीवन में जीवंत प्रवाह,
सुख-दुख किनारों में प्रतिक्षण,
पंथि! सुस्थिर सतत् बढ़े जा राह !
तु योद्धा प्रवीर पुण्य धरा के
 दृढ़ विराट कूट दग्ध-ज्वाल हो,
शत्रुहंता , दीनबन्धु ज्ञानी-विज्ञानी
मही-व्योम संचरित शौर्य सनातन, शक्ति-पुंज लिए विशाल हो !
धर्मयुद्ध में तूम्हें पुनः आज, देना होगा भारी मोल ,
वीरों की इस विशुद्ध परंपरा का,
क्या कोई कर पाया तोल ?
तुम पुण्यपथि हो धर्मधरा के
सुकर्मों की पताका लहराते जाना,
यदि राष्ट्र डूबे यदि धर्म डूबे तो,
बन्धु ! अरि-मस्तक धरणी पर चढ़ाते जाना ।
तुम तो हो हे प्रिय , वसुधा के प्रहरी,
जीयो प्राण गंवाकर ;
परमात्म स्वप्रकाश समेटे तूझमें
,
भूधर-पर्वत-सागर !

✍🏻 आलोक पाण्डेय
         (वाराणसी,भारतभूमि)

गुरुवार, 13 जून 2019

कर्तव्यबोध

रुके हो क्यों ?
अभी तक
खोते साम्राज्य,
ध्वस्त पताकाएं,
खंड-खंड होते स्तम्भ,
धुंधली दिशाएं !
नहीं दीख रहा !
दग्ध ज्वालाएं ,
दहकती विभीषिका
प्रकृति विक्षिन्न ,
निकृष्ट अधम विकृतियों की व्यापकता,
घनीभूत पीड़ा सर्वत्र करूण पुकार,
बर्बरों की पशुता साकार !
लूटता समाज , लूटती गलियां
लुटती सौम्य प्रकृति लुटती कलियां
धुंधलाती परिवेश ;
हाय ! कराहता देश !
क्यों हो स्तब्धित  -
और देखने को है दंश ,
भयावहता पूर्ण विध्वंस !

✍🏼 आलोक पाण्डेय

हे रामम् !

हे रामम् !
जन-जन प्रिय रंजन, नयन अभिरामम् ,
परात्पर परब्रह्म परमात्मन् प्रणामम् !
सत्-चित्-आनन्द घट-घट नामं
सर्वस्व सन्निहित त्वमसि प्राणं
दिव्य शौर्य अनन्त वर्धते उत्साहं ,
ध्यानं नित्यं रक्ष-रक्ष हे रामं ।
विक्षेप-उद्वेग  द्वेष विरागं ,
ले हर संतापं हे वीतरागं !
ध्येये ध्यानं तत्तवमसि ध्यानं ,
तप-ओज-तेज संवाहक रामं ।
जन-जन संपोषक रघुवंशनाथं
भारतभूमि भयी वीरान अनाथं ,
संपीडित संकुचित धरा धामं ;
भयावहता बर्बर म्लेच्छक नामं ।
आपदामपहर्तारं दातारं ,
लोकाभिरामं शत्रु विदारं ;
ध्येये ध्यानं नित्यं ध्यानं ;
काल-कराल संहारक रामं ।
निर्वाक् हिमालयं अहो न गंगा उत्कर्षं ,
कम्पित-शोषित किम्स्थितं अद्य भारतवर्षं ,
भानित शौर्य उन्नत अथाह सुह्रद्हर्षं ;
विस्फोटित विध्वंसित 'अरि ' विविध दुर्धर्षं ।
कुटिल द्रोही दस्यु विनाशनं
नमामि विश्वरूपम् पुण्यम् निदिध्यासनम् !
शत्रुहंता हे हरि , हर विविध विलापं ;
ध्येये ध्यानं नित्यं विशुद्धम् रामं !

✍🏻 आलोक पाण्डेय
      ( वाराणसी,भारतभूमि )

मंगलवार, 4 जून 2019

तुम आओ !


     तुम आओ !
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तुम आओ !
देख पथरीली आंखों का नीर , 
द्रवित हृदयों में पीड गंभीर !
कालाग्नि की दाहकता से 
वत्स टकराओ !
तुम आओ !

हलचल विहीन ज्ञान , निर्विकल्प ज्ञान
निर्विकल्प अवस्था , निर्विकल्प विज्ञान ;
चान्द्रायण तप , कृच्छ , पराक् आदि व्रतों में ,
लगो ! स्वत्व जगाओ ! 
तुम आओ !

स्थूल देह अन्नमय , सन्निहित प्राणमय
अंत:स्थित मनोमय , भीतर प्राणमय ,
पंचकोषों में परस्पर भीतर आनन्दमय ;
अनन्त अखण्ड समाधि लगाओ !
तुम आओ !

‘ घट ’ नाम ‘ घट ’ रूप
‘ पट ’  नाम ‘ पट ’ रूप ,
अनन्त सत्ता , अनन्त आनन्द बोध ,
नाम रूप प्राकट्य अनन्त शोध ;
सत्-चित्-आनन्द-अस्ति , भाति ,
प्रिय उर्ध्व परात्पर ध्यान लगाओ !
तुम आओ !

मल्लिका-मालती-जाती - यूथिका संवहित ,
दिव्य पुष्प प्रफुल्लित , कमल-कमलिनी विकसित् !
शीतल मन्द सुगन्ध पवन संचरित ,
चान्द्रमसी ज्योत्सना सम्यक् विकसित् !
अनन्त आनन्द सर्वत्र मादकता में ,
स्नेह स्पर्श बढ़ाओ !
तुम आओ !

परस्पर सम्मिलन , परस्पर परिरम्भण 
उत्कट उत्कंठा , परस्पर आलिंगन !
सम्प्रयोगात्मक श्रृंगार रस समुद्र में ,
मंगलमय मुखचन्द्र की अधर सुधा बहाओ !
तुम आओ !

                  


सरसी-सरोवरों में , कुमुद-कुमुदनियों में ,
कमल-कमलनियों में , हंस-सारस-कारण्डव आदि विहंगमों में ,
स्निग्ध माधुर्य प्रादुर्भाव कराओ !
तुम आओ !

अमावस्या की अन्धियारी रातों में ,
घनघोर घटा उमड़ रही ,
दादुर ध्वनि सर्वत्र सुहावन‌ लागे ,
दामिनी दमक रही !
मन्द-मन्द शीतल बयार सुगन्धित ,
प्रियतम न वियोग लगाओ !
तुम आओ !

युग-युगान्तरों , कल्प-कल्पान्तरों से संवहित ,
सतत् आनन्द सिन्धु में माधुर्य सार ,
कालान्तर में आज धधकती - कैसा व्यथित सत्य , उद्वेग - विक्षेप उद्गार !
सत्य-न्याय-धर्म , पीड़ितों के प्राण हित ,
दिव्य तेज संवर्धित अथाह शौर्य ले ,
कुटिलों पर काल बरसाओ !
तुम आओ !

✍🏻 आलोक पाण्डेय
             वाराणसी, भारतभूमि

रविवार, 12 मई 2019

                     मां तुझे भूला ना पाया !


माँ!

माँ
एक दिवस मैं रूठा था

बडा ही स्वाभिमानी बन, उऋण हो जाने को
तुमसे भी विरक्त हो जाने को,
त्यागी बन जाने को !
घर त्याग चला कहीं दूर वन को
ध्यानिष्ठ हुआ पर ध्यान नहीं , न शांति होती मन को
यह चक्र सतत् चलता रहा।
पर जननी ! तेरी याद कहाँ भूलता रहा !!
पर नहीं, तप तो करना है;
त्याग धर्म में मरना है,
यह सोच अनवरत् उर्ध्व ध्यान में
हो समाधिस्थ तपः क्षेत्र में,
मन, तन से दृढ हो तप पूर्ण किया
पर नहीं शांति थी ना सुस्थिरता, 

क्या ऐसा अपूर्ण हुआ !!!
बुझा हुआ अब संचित उत्साह था 
नहीं कहीं पूर्ण प्रवाह था ;
अचानक क्षुधा की प्यास लगती
माँ !!!
तेरी कृपा की आस लगती
ममतामयी छाया न भूलती;
        दोपहरी तपी और पाँव जले
        पर कहाँ सघन छाया?
माँ!
तेरी आँचल न भूला पाया; 
हर ओर तुम्हारी थी छाया !

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           ✍🏻 आलोक पाण्डेय
                  ( वाराणसी , भारतभूमि )

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

नमन हे आर्यभट्ट


नमन आर्यभट्ट


ग्रह नक्षत्र सूत्र समेकन नदियों का कल कल निनाद ,
गणित सार ज्योतिष रहस्य करता सदैव हे आर्यभट्ट याद !
है सत्य धरा को तूने शुन्य परिचय ज्ञान दिया ,
सागर की गहराई से अंतरिक्ष ऊंचाई का मान दिया ।
पृथ्वी मान परिक्रमा परिधि को दिखलाया तूने विचित्र ,
 ‘आर्यभट्टीयम’ रचना अमोघ को कैसे दिया साध सुचित्र ।
राष्ट्र गुरु नहीं विश्वगुरु हो , हो भारत की अमर वाणी ;
 युग युग से कीर्ति रहे अमर , हे सुसंस्कृत सभ्यता के प्राणी ।
ग्रह का ज्ञान स्पष्ट परिलक्षित , पाई को तूने साध दिया ,
 खगोल अन्वेषण संधानों से पूरे भूगोल को बांध दिया ।
समस्त भूमण्डल को कर प्रकाशित , किया मेधा शक्ति संपन्न ,
टुकड़े-टुकड़े लुटेरों तंत्र ने आज , हाय ! विघटित कर किया विपन्न ।
दूरदर्शिता विश्व सभ्यता के रक्षक पुन: आओ हे भारत वीर ;
कटुता-विक्षोभ, विघटन मिटाने लाना अतीव सूत्र गंभीर !
हे विप्रश्रेष्ठ ! शत बार नमन ।
अनंत अपार प्रणमन् वंदन !

✍🏻 आलोक पाण्डेय
          वाराणसी,भारतभूमि